Tehri Garhwal

टिहरी में मनरेगा ‘बीमार’: नेटवर्क फेल, मजदूरी कम और मटेरियल भुगतान सालों से लंबित

टिहरी में मनरेगा ‘बीमार’: नेटवर्क फेल, मजदूरी कम और मटेरियल भुगतान सालों से लंबित

टिहरी । ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार देने के उद्देश्य से शुरू की गई महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) टिहरी जनपद के कई गांवों में अब ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है। कमजोर इंटरनेट नेटवर्क, कम मजदूरी और सामग्री भुगतान में हो रही भारी देरी ने इस योजना की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पर्वतीय क्षेत्रों में नेटवर्क की स्थिति इतनी खराब है कि मनरेगा श्रमिकों की ऑनलाइन उपस्थिति तक दर्ज नहीं हो पा रही। सेमल्थ गांव के ग्रामीण कीर्तिदत्त नौटियाल का कहना है कि जॉब कार्ड सत्यापन के लिए उन्हें गांव से दूर जंगलों और ऊंची पहाड़ियों पर जाना पड़ता है, जहां कहीं जाकर नेटवर्क मिलता है। कई बार पूरा दिन काम करने के बाद भी उपस्थिति दर्ज न होने से मजदूरी अटक जाती है।

मजदूरी कम, बाहर ज्यादा आमदनी

मनरेगा श्रमिक कर्णगांव की पवना देवी बताती हैं कि बाहर काम करने पर 400 रुपये से अधिक मजदूरी मिल जाती है, जबकि मनरेगा में सिर्फ करीब 252 रुपये ही मिलते हैं। ऐसे में ग्रामीणों का मनरेगा से मोह भंग होना स्वाभाविक है।

ग्राम प्रधानों पर आर्थिक बोझ

मनरेगा में विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल होने वाली सीमेंट, सरिया और अन्य सामग्री का भुगतान वर्षों से लंबित है। धारकोट के ग्राम प्रधान योगेंद्र नेगी बताते हैं कि भूमि सुधार जैसे कार्यों में कुशल श्रमिकों की जरूरत होती है, लेकिन कुशल श्रमिकों की मजदूरी आने में डेढ़-दो साल लग जाते हैं। वर्तमान में मिस्त्री 700 से 800 रुपये प्रतिदिन लेते हैं, जबकि मनरेगा में उनके लिए महज 250 रुपये का ही प्रावधान है। ऐसे में कार्य कराना लगभग असंभव हो गया है।

सेमल्थ के ग्राम प्रधान अमित गौड़ का कहना है कि डिजिटल दौर में भी उन्हें ऑनलाइन सत्यापन के लिए मीलों दूर जाना पड़ता है। वहीं कर्णगांव के ग्राम प्रधान उदय नेगी ने बताया कि श्रमिकों का भुगतान तो 14 दिन के भीतर हो जाता है, लेकिन सामग्री भुगतान वर्षों से अटका रहता है, जिससे प्रधानों को दुकानदारों का पैसा अपनी जेब से चुकाना पड़ता है, कई बार ब्याज भी देना पड़ता है।

प्रशासन ने मानी समस्या

मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) टिहरी वरुणा अग्रवाल ने माना कि जनपद के कई दूरस्थ क्षेत्रों में कमजोर नेटवर्क के कारण ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करने में परेशानी आ रही है। उन्होंने कहा कि इस समस्या से शासन को अवगत कराया गया है और जहां सामग्री भुगतान लंबित है वहां संबंधित विभागों को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं। नेटवर्क प्रभावित क्षेत्रों में वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।

ग्रामीणों की मांग

ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने सरकार व प्रशासन से नेटवर्क समस्या का स्थायी समाधान निकालने, मनरेगा मजदूरी बढ़ाने और वर्षों से लंबित सामग्री भुगतान शीघ्र कराने की मांग की है, ताकि मनरेगा वास्तव में ग्रामीणों के लिए रोजगार का मजबूत सहारा बन सके।

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