उत्तराखंड

जा बैल उसे मार-

जा बैल उसे मार- 

विक्रम विष्ट 

जा बैल उसे मार,.उसके, इसके, जहां जो मिले नहीं तो अपने ही.गले फंदा डाल। चुनावी सीजन का तकाजा है।

     फल्द यथैं फल्द तथैं कु नटवर लाल जांदू कथैं। इस खेल में माहिर खिलाड़ी कहीँ निगाहें टिका कहीं निशाना लगा रहे हैं। कुछ यत्र-तत्र सींंग ही घूसेड़.रहे हैं। बूढ़े बैल खुद न लग पायें तो दूसरों को क्यों लगने दें।.चाहे घड़बिच हो जाएं खेत नहीं. छोड़ना। अपनी फसल उगे ना उगे दूसरों की मेहनत पर पानी फेरना है। लोकतंत्र के निर्णयकर्ता दिल्ली में.बसते हैं। बाकी तो नाटक है। संकट के समय मोर्चे से फरार नेताओं को चुनें, यही परंपरा है।

       इस परंपरा से निकला जनप्रतिनिधि कितना जनता का प्रतिनिधि होगा, कितना ऊपर से थोपा प्यादा। दशकों के संकर्ष, त्याग और बलिदान से प्राप्त उत्तराखंड के भाग्य में यही झेलना लिखा है या हमने ही बेगार ढ़ोना स्वीकार कर लिया है।

   अमेरिका अपना शासक नीचे से ऊपर की ओर ठोक बजाकर चुनता है। अपने देश में ऊपर के आदेश पर,,,, जा बैल जनता के गले में फंधा डाल! भूल जा पांच साल पीछे के और आगे के लिए भी, कुनबे के सिवाय।

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